लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि आखिर कुछ महीनों से देशभर में अनशन और भ्रष्टाचार जैसे शब्द जोर-शोर से क्यों तैर रहे हैं? हजारों-लाखों लोग दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में भ्रष्टाचार के खिलाफ लामबंद हो जाते हैं। बेशक यह देश की जनता के लिए एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन क्या हम सब ईमानदारी से भ्रष्टाचार से लड़ने की ताकत या नीयत रखते हैं? ऐसा अभी के समय में तो बिल्कुल ही नहीं है। दरअसल भ्रष्टाचार तो हमारी आत्मा में बसा है। यह सौ फीसदी कड़वी सच्चाई है। यहां पर भ्रष्टाचार को सिर्फ आर्थिक दृष्टिकोण से देखना गलत होगा। यह हमारे समाज, हमारे चरित्र, हमारी सोच और हमारे कर्म में रचा-बसा है। भ्रष्टाचार तो हमारी रगों में दौड़ रहा है, भले ही कुछ लोग मेरी इस कड़वी बात से सहमत न हों, लेकिन यही सच है।
मेरा मानना है कि अन्ना के अनशन के बाद भी आज कोई इसांन अपने निजी काम को ईमानदारी से कराने की कोशिश करता भी है तो जल्द हार मानकर सामने वाले को तुरंत घूस का प्रसाद बांट देता है। क्योंकि हर कोई सोचता है कि अब कौन इतने चक्कर काटेगा और अपना समय खराब करेगा। इसी सोच ने तो भ्रष्ट लोगों की झोली भरी है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है। हम भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए कानून की भी बात खूब करते हैं। लेकिन यह बताइए कि अगर घूस लेने वाला और घूस देने वाला दोनों तैयार हो तो कौन सा कानून इन्हें यह करने पर रोक लगा देगा। यह तो वही बात हो गई कि मियां बीबी राजी तो क्या करेगा काजी। इसलिए भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए हमें सबसे पहले आत्मा से ईमानदार और साफ नियत वाला बनना पहले जरूरी है।.jpg)
भ्रष्टाचार में हम आज इतने डूबे हुए हैं कि जब कभी भी हमें मौका मिलता है, हम मौके पर चौके जड़ने से चूकते नहीं हैं। वरना क्या वजह है कि सब कुछ से संपन्न इंसान भी करोड़ों रुपए का गोलमाल कर जाता है। स्वार्थ, प्रलोभन, महत्वाकांक्षा और अधिक पाने की चाहत ने हमें अंधा बना दिया और भ्रष्टाचार का गुलाम। आज इसी देश में ऐसे कई उदाहरण हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी में पूरी ईमानदारी को बरकरार रखा और शान से सर उठाके शीर्ष पर पहुंचे। पेशा के नाम पर भ्रष्टाचार करने वालों की आज सबसे लंबी फौज है। वकील अपने क्लाइंट से केस के नाम पर पैसे उगाहता है, पुलिस वाला नेशनल हाइवे पर ट्रक ड्राइवर से 50-100 रुपए की उगाही में लगा है, कॉरपोरेट में डील के लिए मोटी रकम की आरती की जाती है, बाबू व साहब तो पान दबाए बड़े प्यार से मीठी बातें कर कोड वर्ड में सेवा की रकम समझा जाते हैं। ऐसी सूची बड़ी लंबी हो सकती है। फिर हम किस बात के लिए भ्रष्टाचार से लड़ने की बात करते हैं जब हम खुद ही लड़ने और ईमानदार बनने को तैयार नहीं।
बात सामाजिक भ्रष्टाचार की भी जरूर होनी चाहिए। छोटे शहरों में तो सामाजिक भ्रष्टाचार थोड़ी कम भी है। महानगरों में तो यह अपने चरम पर है। शहर में सड़क पर अगर किसी का एक्सीडेंट हो जाय तो कुछ ही ऐसे लोग हैं जो मदद के लिए दौड़ते हैं, वरना टाई और कोट पहन कर बड़ी गाड़ियों में चलने वाले तो उसके बगल से गुजर जाते हैं। हम अक्सर सोचते हैं कि अपना क्या जाता है और कौन मुफ्त में अपने सिर परेशानी ले। भ्रष्टाचार की हालत तो इतनी खराब है कि घंटों इस पर लगातार बहस चल सकती है। लेकिन कुल मिलाकर हमें अपने आप को आत्मा से ईमानदार, संतुष्ट और मदद करने जैसी इच्छाशक्ति जगानी होगी, वरना अन्ना जैसे आंदोलन होते रहेंगे और कुछ दिनों बाद भुला दिये जाते रहेंगे।
(लेखक हिन्दुस्तान, दिल्ली में कार्यरत हैं)
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