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कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि। इसको पूर्वी या भोजपुरी-मैथिली-मगही में ‘छठ’ कहते हैं। यह पर्व सांस्कृतिक रूप से भारत की पूर्वी जाति को अपने ही तरह से आलोड़ित करता है। इसे मात्र धार्मिकता तक सीमित कर देना इसका संकुचन है। इसका विस्तार तो तब है, जब इसे हम संस्कृति का पल्लवनरूप स्वीकार करें। ‘छठ’ को हमने यही रूप दिया है।

यह दीपावली के छठवें दिन आता है। प्रसन्न समय: जब न गरमी अधिक हो, न सर्दी। वृहत्तर रूप से पारिस्थितिकी को लक्ष्य करता हुआ पर्व। जल में खड़े रहकर सूर्य की उपासना। विविध फलों का समाहार। गन्ने या ईख का वार्षिक शुभारंभ। मिष्ठान का आधारभूत हेतु ही कृषि समाजों में ईख है। यह एक विशिष्ट बात है कि आधुनिक समाजों व नागरिक संवेदना के समय में ग्रामीणता के बेहतर व प्रगतिशील पक्ष स्वीकार किए जाते हैं। लोक में अपना चेहरा छिपाकर दुनिया का समकाल नहीं रचा जा सकता, लोक की षष्ठी में हमारा आज दिखना चाहिए। 


सूर्य के तीन पग पारंपरिक रूप से  माने जाते हैं- प्रभात, मध्याह्न् व संध्या, जिनसे वह संपूर्ण पृथ्वी व आकाश को नाप देता है। सूर्य की ऊष्मा के बिना जीवन संभव नहीं। कृषि सूर्य की ऊष्मा पर निर्भर है। पर्यावरण व पारिस्थितिकी के संतुलन चक्र के लिए जल व सूर्य के प्रति समादर। उनको जीवन का मालिक, हिस्सा बनाना।


सूर्य देवता के अनेक मंदिर प्रसिद्ध हैं। कोणार्क (ओडिसा), लोलार्क (वाराणसी) तथा देवलार्क या देवलास (मऊ, उ.प्र.)। इनमें देवलार्कका सूर्य मंदिर अत्यंत प्राचीन है। जहां छठ मेला सैकड़ों वर्षो से लगता है। यह मेला किसान की समस्त आवश्यकताओं को पूरा करने व संस्कृति पल्लवन के लिए लगता है। विविध ढंग की भोजपुरी मिठाइयां। हल, कुदाल से लेकर आज के समय की वस्तुएं। उत्सव हमारे जीवन को आर्थिक समृद्धि देते हैं, तभी तो वे हमारे इतने निकट हैं। घर, गांव-गिरांव की साफ-सफाई व सुरुचिपूर्ण तरीके से भूमि व भित्ति-चित्रण। ऋतु परिवर्तन की शिल्पात्मक अभिव्यक्ति।


षष्ठी (या छठ पर्व) हमें अपनी धरती से अनुप्राणित रहने का कलानुशासन देती है। तमाम प्रतिकूलित परिस्थितियों में उल्लासपूर्वक जीवन जीने का संतुलन प्रकृति के साहचर्य का स्नेह तो अपनी भाषा की मिठास को बचाए रखने का उपक्रम। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता व अन्य स्थलों पर प्रवास में भी रहकर समजान दृष्टि का परिचय। आदित्य की तरह ऊष्मावान बने रहना। निर्भय, निडर रहना। दूसरे को दबाना नहीं, दूसरे से दबना नहीं। सबको ऊर्जा देना- सूर्य की तरह। सबको जल देना- नदी की तरह। सतत सतर्क, अथक परिश्रमशील व अपने आंतरिक कला-रचाव से लोक व समकाल के संतुलन के साथ बहुलवादी बने रहना। छठ सूर्य की रोशनी का कलापर्व है।

(लेखक साहित्यकार एवं मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली के सचिव हैं।)
 
         
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