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ऐसा कहा जाता है कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है। दिमाग इन दिनों अपना भी खाली है। खाली बोले तो शून्य। ताज्जुब है कि अभी तक किसी शैतान ने इस शून्य स्पेस में डेरा क्यों नहीं जमाया? अलबत्ता बचा-खुचा साधु इस चिंतन में डूबा है कि सावन लगते ही त्योहारों की बाढ़ क्यों आ जाती है अपने यहां?

फिलहाल इस बाढ़ का पानी रक्षा बंधन की ‘भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना’ से जो बढ़ना शुरू होता है, तो वह ‘सजना है मुझे सजना के लिए’  वाले करवाचौथ के साथ खतरे के निशान तक पहुंच चुका है। खतरे का निशान बोले तो दिवाली। दिमाग के साथ जेब भी खाली। रुपये की नैया डूबनी ही है। डिस्काउंट और सेल के वेश में विचरते स्वर्ण-मृगों को पकड़ने की फरमाइश से ‘धन-हरण’ अवश्यंभावी है ।


सिर पर दिवाली, वह भी महीने के आखिरी दिनों में। लक्ष्मी के स्वागत के लिए सभी चादर से बाहर पांव पसार दिवांध बनने की चेष्टा में। कभी इसी पर्व पर एक मशहूर उद्योगपति ने अपनी वाइफ को करोड़ों का विमान गिफ्ट किया था। प्राथमिक आवश्यकताओं से निपटते गृहलक्ष्मी के साथ यह छत्तीसवीं दीवाली होगी, एक सेकेंड हैंड कार गिफ्ट करने लायक तक लक्ष्मी टिक नहीं सकीं बंदे के पास। बाप-दादा के जमाने में तीज-त्योहार आपसी चर्चा में निपट जाते थे। अतिशयता और आडंबर घर की चारदीवारी या मोहल्ले की बात-बेबात चर्चाओं तक ही सिमटे रहते। पत्रों और पंचांगों में मर्यादित भाव में स्थिर रहने वाले त्योहार अब अखबार और टीवी में सुबह-शाम, दिन-रात हुल्लड़ मचाते रहते हैं। नानी-दादी के वक्त से और आज के दौर के करवाचौथ में राई तरबूज का अंतर है।


खाली दिमाग सोच रहा है कि लक्ष्मी फिर कब धार्मिकता के साथ पूजी जाएंगी? नव-कुबेर कब तक पटाखों पर पैसे फूंकते रहेंगे? मेवा, मिठाई, सूटलेंथ, ज्वैलरी और अलग-अलग किस्म के गिफ्ट सहेजने में समरथ टाइप्स के लोगों के घर छोटे पड़ जाते हैं दिवाली पर। नसीब अपना-अपना।


एनी वे, बत्तीस रुपये में गुजर-बसर करने वाले क्लास को भी दीपावली की शुभकामनाएं। सॉरी! हैप्पी दिवाली। सरकार का ही शुभ और सरकार को ही लाभ।  
                    
(लेखक व्यंग्यकार हैं)
 
         
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