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दीपावली आने को है। उजाले के इस त्योहार के स्वागत की तैयारियां चल रही हैं। इस अवसर पर स्वजनों के बीच उपहारों के आदान-प्रदान की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस परंपरा का निर्वाह अब भी हो रहा है। उपहार में सोना-चांदी के जेवरों से लेकर आम उपभोक्ता सामग्रियां दी-ली जा रही हैं। और ‘कुछ नहीं, तो मिठाई सही’ इस मान्यता के साथ मित्रों-परिचितों को मिठाई का एक डिब्बा, सामान्य आय-वर्ग का व्यक्ति भी अवश्य भेंट करता है। यह भेंट धार्मिक मान्यताओं के कारण ही हो आवश्यक नहीं। परंपराओं के निर्वाह की धारणा से भी यह भेंट हमारे समाज में प्रचलित है। इससे इतर, हमारे रीति-रिवाजों, तीज-त्योहारों में मिष्ठान का विशेष महत्व है। रूढ़ियों के निर्वाह के अलावा उपहारों का आदान-प्रदान अब ‘स्टेटस-सिंबल’ भी है। और इसी के साथ हजारों क्विंटल मिलावटी या नकली मावा जब्त किए जाने की खबरें भी आने लगी हैं। दीपावली के आते ही मिठाई विक्रेताओं की गहमागहमी बढ़ जाती है। मिठाई की मांग बढ़ती है और इसकी पूर्ति के लिए मिलावटी या नकली मावे की बाजार में आमद होती है। यह तो अब सभी जानते हैं कि नकली मावे में डिटर्जेट और यूरिया जैसे विषैले पदार्थ काफी मात्र में होते हैं। यह हर दिवाली में होता है, मगर कोई स्थायी निदान सामने नहीं आता। गिरफ्तार-मिलावटखोर कानूनी दांव-पेच और अन्य हथकंडों से आरोप मुक्त हो जाते हैं। फिर मिलावटी मावा बनाने का सिलसिला दीपावली आने से पहले आरंभ हो जाता है। जब कुछ निहित स्वार्थ परंपरा का फायदा उठाकर हमारे स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने की हद तक चले जाएं, तो परंपरा को बदल देने में ही भलाई है। क्यों न इस दीपावली पर अपने मित्रों और परिजनों को कुछ ऐसा भेंट किया जाए, जिसका प्रभाव अच्छा हो।

दीपावली उजाले का त्योहार है। उपहार देने वाले लोग अवश्य सोचें कि उनके उपहारों का उद्देश्य क्या है? अपने मित्रों, अपने प्रियजनों के सम्मुख एक स्मृति-चिन्ह उपस्थित कर उनके जीवन में उजास की कामना करना। यही न? बेहतर तो यही है कि हम एक बार फिर सोचें कि इन मिठाइयों (जिनके मिलावटी होने की आशंका अधिक है) का बेहतर विकल्प क्या किताबें नहीं हैं? यदि हैं, तो क्यों न इस दीपावली में हम नई परंपरा का आगाज करें और दीपावली में अपने प्रियजनों को उनकी रुचि की कोई प्यारी-सी पुस्तक भेंट करें। यह एक ऐसा उपहार है, जिसके लिए आपके पास चुनने के विकल्प ही विकल्प हैं। हर रुचि के लिए, हर बजट के लिए, हर उम्र के लिए और यहां तक कि हर मौके के लिए भी। ऐसा करके आप उस अपराध बोध से भी मुक्ति पा सकते हैं कि किताबें पढ़ने की आदत डालने के लिए हम कुछ करते क्यों नहीं? यह भेंट बरसों तक आपके प्रियजन की ‘बुक-शेल्फ’ में यादगार के रूप में सुरक्षित रहेगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
 
         
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