कम संसाधन और कम बजट के बावजूद भारत आज अंतरिक्ष में कीर्तिमान स्थापित करने में लगा हुआ है। वर्ष 2011 में अब तक भारत छह उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ चुका है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान इसरो ने 12 अक्टूबर को श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी-सी18 लांच करके चार उपग्रहों को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करने में सफलता हासिल की है। इस क्षेत्र में भारत की सफलता का सबसे बड़ा कारण है भारतीय प्रक्षेपण रॉकेटों की लागत का बहुत कम होना। पश्चिमी देशों के मुकाबले हमारे यहां इनकी विकास लागत एक तिहाई है। भारत ने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में कम संसाधन व कम बजट में न सिर्फ अपने आप को जीवित रखा है, बल्कि बेहतरीन प्रदर्शन भी किया है।
अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में हम लगातार प्रगति तो जरूर कर रहे हैं, लेकिन अब भी हम इस क्षेत्र में पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। अब भी हम जियोसिंक्रोनाइज उपग्रह छोड़ने के लिए ऐरियन स्पेस पर निर्भर हैं और हमारे ऐसे उपग्रह उस कंपनी के लांचपैड फ्रेंच गुयाना से प्रक्षेपित होते हैं। ऐसी सफलता हमें तभी तक मिल सकी थी, जब तक हम सोवियत संघ से क्रायोजेनिक इंजन प्राप्त कर रहे थे। लेकिन इस मामले में अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद जब यह तकनीक हमें मिलनी बंद हो गई, तो भारत ने स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन विकसित करने का फैसला किया। लेकिन इस काम में अभी तक पूरी सफलता नहीं मिल सकी है। भारत ने जो क्रायोजेनिक इंजन बनाए, वे प्रयोगशाला स्तर पर तो सफल रहे, लेकिन जब इस इंजन को जीएसएलवी रॉकेट में लगाया गया, तो वह फेल हो गया।
इस नाकामी के बावजूद उपग्रह के प्रक्षेपण में भारत कारोबारी छलांग पहले ही लगा चुका है। लगभग पांच साल पहले भारत के प्रक्षेपण यान ने इटली के खगोल उपग्रह एंजिल का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया था। यह पहला सफल कारोबारी प्रक्षेपण था, जिससे भारत दुनिया के पांच देशों अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया था। इतना ही नहीं, भारत अपने उपग्रहों को लांच करने के लिए जिस एरियन स्पेस की मदद लेता है, उसके साथ इसरो का कारोबारी समझौता है। इस समझौते के अनुसार, जरूरत पड़ने पर एरियन स्पेस किसी उपग्रह को लांच करने के लिए इसरो के रॉकेट की मदद ले सकता है। इसरो के रॉकेट की साख उसकी सफलता की वजह से तो है ही, उसकी प्रतिष्ठा इस वजह से भी है कि पीएसएलवी के लांच में भारत की विफलता की दर बहुत कम है।
इस समय भारत की सबसे बड़ी जरूरत क्रायोजेनिक तकनीक में सफलता हासिल करना है। जब तक भारत इस बाधा को पार नहीं कर लेता, तब तक चंद्रमा पर मानव दल भेजने जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं संदेह के घेरे में ही रहेंगी।
(लेखक सेंट मार्गरेट इंजीनियरिंग कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में हम लगातार प्रगति तो जरूर कर रहे हैं, लेकिन अब भी हम इस क्षेत्र में पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। अब भी हम जियोसिंक्रोनाइज उपग्रह छोड़ने के लिए ऐरियन स्पेस पर निर्भर हैं और हमारे ऐसे उपग्रह उस कंपनी के लांचपैड फ्रेंच गुयाना से प्रक्षेपित होते हैं। ऐसी सफलता हमें तभी तक मिल सकी थी, जब तक हम सोवियत संघ से क्रायोजेनिक इंजन प्राप्त कर रहे थे। लेकिन इस मामले में अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद जब यह तकनीक हमें मिलनी बंद हो गई, तो भारत ने स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन विकसित करने का फैसला किया। लेकिन इस काम में अभी तक पूरी सफलता नहीं मिल सकी है। भारत ने जो क्रायोजेनिक इंजन बनाए, वे प्रयोगशाला स्तर पर तो सफल रहे, लेकिन जब इस इंजन को जीएसएलवी रॉकेट में लगाया गया, तो वह फेल हो गया।
इस नाकामी के बावजूद उपग्रह के प्रक्षेपण में भारत कारोबारी छलांग पहले ही लगा चुका है। लगभग पांच साल पहले भारत के प्रक्षेपण यान ने इटली के खगोल उपग्रह एंजिल का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया था। यह पहला सफल कारोबारी प्रक्षेपण था, जिससे भारत दुनिया के पांच देशों अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया था। इतना ही नहीं, भारत अपने उपग्रहों को लांच करने के लिए जिस एरियन स्पेस की मदद लेता है, उसके साथ इसरो का कारोबारी समझौता है। इस समझौते के अनुसार, जरूरत पड़ने पर एरियन स्पेस किसी उपग्रह को लांच करने के लिए इसरो के रॉकेट की मदद ले सकता है। इसरो के रॉकेट की साख उसकी सफलता की वजह से तो है ही, उसकी प्रतिष्ठा इस वजह से भी है कि पीएसएलवी के लांच में भारत की विफलता की दर बहुत कम है।
इस समय भारत की सबसे बड़ी जरूरत क्रायोजेनिक तकनीक में सफलता हासिल करना है। जब तक भारत इस बाधा को पार नहीं कर लेता, तब तक चंद्रमा पर मानव दल भेजने जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं संदेह के घेरे में ही रहेंगी।
(लेखक सेंट मार्गरेट इंजीनियरिंग कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)
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