लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं कि हितों के टकराव ने भारतीय क्रिकेट के चेहरे को बदसूरत बना दिया है। खासतौर पर जब से कृष्णामचारी श्रीकांत, सुनील गावस्कर, रवि शास्त्री और यहां तक कि अनिल कुंबले जैसे पूर्व कप्तान शक के दायरे में आए हैं।शुरु में ही बता दूं कि यह भारतीय खेल जगत में खदबदाहट के विकास का दौर है। पिछले तीन-चार दशक में हालात और समाज नाटकीय ढंग से बदल गए हैं। खेल अब महज एक शौक नहीं रहा, एक उद्योग बन गया है। लेकिन बहुत से आलोचक और प्रशंसक अब भी यही उम्मीद रखते हैं कि खिलाड़ियों को आदर्श बने रहना चाहिए, खासतौर पर कमाई के मामले में।
खेल में कारोबार के बढ़ते जाने का क्या अर्थ होता है खुद खिलाड़ी भी उसे लेकर पूरी तरह सहज नहीं हो पाए हैं। मसलन हम भारतीय क्रिकेट को ही लें। अब यह महज खेल भर नहीं है, यह करोड़ों-अरबों डॉलर का कारोबार है। ऐसे में यह जरूरी है कि इसमें शामिल कंपनियों की व्यवस्था और प्रकिया में पूरी पारदर्शिता हो। यहीं पर हितों के टकराव का मसला आता है। इसका सीधा-सा अर्थ होता है कि जब किसी व्यक्ति या संगठन के एक साथ कई तरह के हित हों, तो किसी एक हित के लिए दूसरा भ्रष्ट आचरण का कारण बन सकता है। लेकिन यह परिभाषा कुंबले के मामले में ही नहीं लागू होती, बल्कि भारतीय क्रिकेट में अक्सर ही ऐसे मामले उठते रहते हैं।
मैं अभी तक यह समझ पाया हूं कि भारत के सभी क्रिकेट खिलाड़ी, नए और पुराने सभी, हितों के टकराव का मतलब ही पूरी तरह नहीं समझते। वे सबसे ऊंचे स्तर पर पूरा ध्यान लगाकर खेलते हैं और अपने लिए, अपनी टीम के लिए, अपने देश के लिए बहुत सी उपलब्धियां भी हासिल करते हैं। इसलिए जब कोई उनकी नीयत पर सवाल उठाता है, तो इसे वे अपने ऊपर लगे दाग की तरह देखते हैं, वे खिलाड़ी भी, जो खेलना छोड़ चुके हैं।
यह उनके लालच या निहित स्वार्थ का मामला नहीं है, यह उनकी सोच की सीमाओं का मामला है, जिसकी वजह से वे इसे समझ ही नहीं पाते। अगर खेल प्रशासन के मानकों और कार्य-व्यवहार में ढीलापन होगा, तो इससे हितों के टकराव की गुंजाइश बनेगी, बहुत से लोग इस समस्या को देख तक नहीं पाते हैं। मसलन, गावस्कर और शास्त्री भले ही क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पे-रोल पर हैं, लेकिन एक क्रिकेट कमेंटेटर के रूप में वे पूरी तरह स्वतंत्र बने रह सकते हैं। लेकिन क्या यह बात उस पर भी लागू होगी, जिसके पास इतनी बड़ी शख्सियत नहीं है? इसलिए कोशिश यही होनी चाहिए कि कोई भ्रष्टाचार सामने आए, इसके पहले ही हितों के टकराव की गुंजाइश को खत्म कर दिया जाए। या ऐसी व्यवस्था बना दी जाए, जिसमें यह आशंका बहुत कम रह जाए।
हितों के टकराव की समस्या को न भावुक होकर देखा जा सकता है, न संकुचित दिमाग से और न आदर्शवादी ढंग से। जरूरी है कि इसे तर्क, कानून और विवेक की कसौटी से देखा जाए। जैसे कुंबले के खिलाफ हितों के टकराव का जो मामला उठा है, वह उनके कई संगठनों में होने को लेकर है, इस मामले को हमें सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर ही देखना होगा।
अनिल कुंबले कर्नाटक राज्य क्रिकेट एसोसिएशन के निर्वाचित अध्यक्ष हैं। उन्होंने इंडियन प्रीमियर लीग या आईपीएल की रॉयल चैलेंजर्स बंगलुरु टीम के कप्तान पद से तो इस्तीफा दे दिया, लेकिन वह अब भी इस टीम से जुड़े हुए हैं। कर्नाटक राज्य क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष के तौर पर वह कर्नाटक की टीम के चयन के लिए चयनकर्ताओं की नियुक्ति करते हैं। लेकिन इसके साथ ही वह ऐसी एक कंपनी के मालिक भी हैं, जो कर्नाटक के दो खिलाड़ियों के मैनेजमेंट का काम देखती है। नीयत पर कोई सवाल उठाए बगैर भी हम यहां उन संगठनों में हितों का टकराव साफ तौर पर देख सकते हैं, जिनसे अनिल कुंबले जुड़े हैं।
इसी तरह क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन को लेकर भी चर्चा इन दिनों काफी गरम है। वह आईपीएल की टीम चेन्नई सुपर किंग के मालिक भी हैं। इसी तरह चयन समिति के अध्यक्ष के श्रीकांत इस टीम के प्रतिनिधि भी हैं। आईपीएल से हटाए गए ललित मोदी पर सबसे बड़ा आरोप यही था कि उनके परिवार के कई सदस्य और उनके कई दोस्त आईपीएल की टीमों के साथ वित्तीय रूप से जुड़े थे। क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने इस बात की कभी घोषणा नहीं की थी कि गावस्कर और शास्त्री कमेंटेटर के तौर पर उससे तनख्वाह लेते हैं।
इस सब में मूल समस्या यह दिखाई देती है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने मानक और कार्य-व्यवहार तय ही नहीं किए हैं, जो खेल में विभिन्न भूमिकाएं तय कर रहे प्रशासकों और खिलाड़ियों पर लागू होते हों। इनमें पुराने खिलाड़ी भी शामिल हैं और वर्तमान खिलाड़ी भी। इन सभी लोगों की विश्वसनीयता, चरित्र और नीयत संदेह से परे है, इस पर कोई संदेह नहीं है। लेकिन फिर भी इस समस्या को सुलझाना जरूरी है, ताकि भविष्य में हितों के टकराव का कोई सवाल न उठ सके।
यह सवाल पूछा जा सकता है कि अगर बोर्ड के सदस्य एक साथ कई भूमिकाओं में रह सकते हैं, तो खिलाड़ी क्यों नहीं? बोर्ड अगर इस तरह के नियम-कायदे बना देता है, तो वह खिलाड़ियों और प्रशासकों, दोनों पर लागू होंगे, और तब इस तरह के सवाल नहीं बचेंगे। एक सुझाव यह हो सकता है कि बोर्ड को उस हिंदू अविभाजित परिवार की तरह व्यवहार बंद कर देना चाहिए, जहां सभी फैसले बंद कमरे में होते हैं, इसके बजाय उसे खुद को ज्यादा पारदर्शी बनाना चाहिए।
निस्संदेह, इनमें से बहुत सारी समस्याएं इसलिए खड़ी हो रही हैं, क्योंकि बोर्ड के पास अथाह पैसा है। पैसे की इस मात्र के कारण ही अब उस बंद कमरे में फैसले वाले तौर-तरीकों की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। देश में जिस भारी संख्या में क्रिकेट के समर्पित प्रशंसक हैं, और जिस तरह से यह लोगों की जिंदगी के साथ जुड़ा है, उसे देखते हुए बोर्ड के कंधों पर और भी ज्यादा जिम्मेदारी आ जाती है कि वह पूरी प्रक्रिया को स्वच्छ करे। इसके पहले कि हालात काबू से बाहर हो जाएं, अगर बोर्ड इस काम को कर लेता है, तो इससे उसकी प्रतिष्ठा ही बढ़ेगी।
(लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार है। उनका यह आलेख हिन्दुस्तान में प्रकाशित हो चुका है। इस लेख को वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है।)
खेल में कारोबार के बढ़ते जाने का क्या अर्थ होता है खुद खिलाड़ी भी उसे लेकर पूरी तरह सहज नहीं हो पाए हैं। मसलन हम भारतीय क्रिकेट को ही लें। अब यह महज खेल भर नहीं है, यह करोड़ों-अरबों डॉलर का कारोबार है। ऐसे में यह जरूरी है कि इसमें शामिल कंपनियों की व्यवस्था और प्रकिया में पूरी पारदर्शिता हो। यहीं पर हितों के टकराव का मसला आता है। इसका सीधा-सा अर्थ होता है कि जब किसी व्यक्ति या संगठन के एक साथ कई तरह के हित हों, तो किसी एक हित के लिए दूसरा भ्रष्ट आचरण का कारण बन सकता है। लेकिन यह परिभाषा कुंबले के मामले में ही नहीं लागू होती, बल्कि भारतीय क्रिकेट में अक्सर ही ऐसे मामले उठते रहते हैं।

मैं अभी तक यह समझ पाया हूं कि भारत के सभी क्रिकेट खिलाड़ी, नए और पुराने सभी, हितों के टकराव का मतलब ही पूरी तरह नहीं समझते। वे सबसे ऊंचे स्तर पर पूरा ध्यान लगाकर खेलते हैं और अपने लिए, अपनी टीम के लिए, अपने देश के लिए बहुत सी उपलब्धियां भी हासिल करते हैं। इसलिए जब कोई उनकी नीयत पर सवाल उठाता है, तो इसे वे अपने ऊपर लगे दाग की तरह देखते हैं, वे खिलाड़ी भी, जो खेलना छोड़ चुके हैं।
यह उनके लालच या निहित स्वार्थ का मामला नहीं है, यह उनकी सोच की सीमाओं का मामला है, जिसकी वजह से वे इसे समझ ही नहीं पाते। अगर खेल प्रशासन के मानकों और कार्य-व्यवहार में ढीलापन होगा, तो इससे हितों के टकराव की गुंजाइश बनेगी, बहुत से लोग इस समस्या को देख तक नहीं पाते हैं। मसलन, गावस्कर और शास्त्री भले ही क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पे-रोल पर हैं, लेकिन एक क्रिकेट कमेंटेटर के रूप में वे पूरी तरह स्वतंत्र बने रह सकते हैं। लेकिन क्या यह बात उस पर भी लागू होगी, जिसके पास इतनी बड़ी शख्सियत नहीं है? इसलिए कोशिश यही होनी चाहिए कि कोई भ्रष्टाचार सामने आए, इसके पहले ही हितों के टकराव की गुंजाइश को खत्म कर दिया जाए। या ऐसी व्यवस्था बना दी जाए, जिसमें यह आशंका बहुत कम रह जाए।
हितों के टकराव की समस्या को न भावुक होकर देखा जा सकता है, न संकुचित दिमाग से और न आदर्शवादी ढंग से। जरूरी है कि इसे तर्क, कानून और विवेक की कसौटी से देखा जाए। जैसे कुंबले के खिलाफ हितों के टकराव का जो मामला उठा है, वह उनके कई संगठनों में होने को लेकर है, इस मामले को हमें सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर ही देखना होगा।
अनिल कुंबले कर्नाटक राज्य क्रिकेट एसोसिएशन के निर्वाचित अध्यक्ष हैं। उन्होंने इंडियन प्रीमियर लीग या आईपीएल की रॉयल चैलेंजर्स बंगलुरु टीम के कप्तान पद से तो इस्तीफा दे दिया, लेकिन वह अब भी इस टीम से जुड़े हुए हैं। कर्नाटक राज्य क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष के तौर पर वह कर्नाटक की टीम के चयन के लिए चयनकर्ताओं की नियुक्ति करते हैं। लेकिन इसके साथ ही वह ऐसी एक कंपनी के मालिक भी हैं, जो कर्नाटक के दो खिलाड़ियों के मैनेजमेंट का काम देखती है। नीयत पर कोई सवाल उठाए बगैर भी हम यहां उन संगठनों में हितों का टकराव साफ तौर पर देख सकते हैं, जिनसे अनिल कुंबले जुड़े हैं।
इसी तरह क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन को लेकर भी चर्चा इन दिनों काफी गरम है। वह आईपीएल की टीम चेन्नई सुपर किंग के मालिक भी हैं। इसी तरह चयन समिति के अध्यक्ष के श्रीकांत इस टीम के प्रतिनिधि भी हैं। आईपीएल से हटाए गए ललित मोदी पर सबसे बड़ा आरोप यही था कि उनके परिवार के कई सदस्य और उनके कई दोस्त आईपीएल की टीमों के साथ वित्तीय रूप से जुड़े थे। क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने इस बात की कभी घोषणा नहीं की थी कि गावस्कर और शास्त्री कमेंटेटर के तौर पर उससे तनख्वाह लेते हैं।
इस सब में मूल समस्या यह दिखाई देती है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने मानक और कार्य-व्यवहार तय ही नहीं किए हैं, जो खेल में विभिन्न भूमिकाएं तय कर रहे प्रशासकों और खिलाड़ियों पर लागू होते हों। इनमें पुराने खिलाड़ी भी शामिल हैं और वर्तमान खिलाड़ी भी। इन सभी लोगों की विश्वसनीयता, चरित्र और नीयत संदेह से परे है, इस पर कोई संदेह नहीं है। लेकिन फिर भी इस समस्या को सुलझाना जरूरी है, ताकि भविष्य में हितों के टकराव का कोई सवाल न उठ सके।
यह सवाल पूछा जा सकता है कि अगर बोर्ड के सदस्य एक साथ कई भूमिकाओं में रह सकते हैं, तो खिलाड़ी क्यों नहीं? बोर्ड अगर इस तरह के नियम-कायदे बना देता है, तो वह खिलाड़ियों और प्रशासकों, दोनों पर लागू होंगे, और तब इस तरह के सवाल नहीं बचेंगे। एक सुझाव यह हो सकता है कि बोर्ड को उस हिंदू अविभाजित परिवार की तरह व्यवहार बंद कर देना चाहिए, जहां सभी फैसले बंद कमरे में होते हैं, इसके बजाय उसे खुद को ज्यादा पारदर्शी बनाना चाहिए।
निस्संदेह, इनमें से बहुत सारी समस्याएं इसलिए खड़ी हो रही हैं, क्योंकि बोर्ड के पास अथाह पैसा है। पैसे की इस मात्र के कारण ही अब उस बंद कमरे में फैसले वाले तौर-तरीकों की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। देश में जिस भारी संख्या में क्रिकेट के समर्पित प्रशंसक हैं, और जिस तरह से यह लोगों की जिंदगी के साथ जुड़ा है, उसे देखते हुए बोर्ड के कंधों पर और भी ज्यादा जिम्मेदारी आ जाती है कि वह पूरी प्रक्रिया को स्वच्छ करे। इसके पहले कि हालात काबू से बाहर हो जाएं, अगर बोर्ड इस काम को कर लेता है, तो इससे उसकी प्रतिष्ठा ही बढ़ेगी।
(लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार है। उनका यह आलेख हिन्दुस्तान में प्रकाशित हो चुका है। इस लेख को वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है।)
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