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ताकि क्रिकेट फिर बदनाम न हो

प्रकाशन :गुरूवार, 3 नवम्बर 2011
विक मार्क्स
स्पॉट फिक्सिंग के मामले में पाकिस्तान के दो बड़े क्रिकेटरों सलमान बट और मोहम्मद आसिफ का दोषी पाया जाना वास्तव में क्रिकेट के लिए काला दिन नहीं है। यह एक अभूतपूर्व मुकदमा है, खासकर इस फिक्सिंग का भंडाफोड़ करने वाले अखबारन्यूज ऑफ द वर्ल्ड  के लोगों के लिए, क्योंकि अब यह अखबार अस्तित्व में नहीं है। क्रिकेट में दिलचस्पी रखने वाले तमाम लोगों को यह कामना करनी चाहिए कि इस मुकदमे में जो फैसला आए, उसकी गूंज दुनिया के सभी ड्रेसिंग रूमों में सुनाई पड़ती रहे और इसका प्रभाव सिर्फ पाकिस्तानी क्रिकेटरों को घेरने तक सीमित न रह पाए।

इससे पहले क्रिकेट में किसी तरह की बेईमानी को सजा के अंजाम तक शायद ही पहुंचाया जा सका है। अब से पहले के अपराधों की या तो जांच नहीं हो पाई या फिर उन्हें साबित नहीं किया जा सका। लेकिन इस बार यह नहीं कहा जा सकता। साउथवर्क क्राउन कोर्ट ने सलमान बट और मोहम्मद आसिफ को दोषी पाया है (तीसरे खिलाड़ी मोहम्मद आमिर ने अपने ऊपर लगे आरोपों को पहले ही कोर्ट में स्वीकार कर लिया है) और इसका महत्वपूर्ण प्रभाव अब यह होगा कि सभी महाद्वीपों के खिलाड़ी इससे भली-भांति वाकिफ हो जाएंगे। चूंकि फिक्सिंग को साबित करना अपने आप में बेहद मुश्किल काम है और क्रिकेट पदाधिकारियों के पास इससे निपटने का जो सबसे महत्वपूर्ण हथियार है, वह है खिलाड़ियों को फिक्सिंग के विरुद्ध जागरूक बनाना और भय दिखाकर इससे अलग रखना। ऐसे में, इस मुकदमे को निर्णायक बनना चाहिए, ताकि यह क्रिकेट को पेशेवर कैरियर के तौर पर अपनाने को लालायित नए खिलाड़ियों को बेईमानी से दूर रहने के लिए शिक्षित भी कर सके और उनमें भय भी पैदा करे।


इन तीनों क्रिकेटरों को दोषी पाए जाने से पुराने खिलाड़ी कतई हैरान नहीं हैं। सच तो यह है कि यदि अदालत इन्हें ‘अपराध मुक्त’ घोषित कर देती, तो वह क्रिकेट के लिए काला दिन होता। दरअसल, अगस्त 2010 के लॉर्डस मैच की वह साधारण तस्वीर किसी भी वकील की जोरदार दलीलों के बराबर है। उस तस्वीर में पाकिस्तानी टीम के तत्कालीन कप्तान सलमान बट मिड-ऑफ पर खड़े हैं और उनका बॉलर गेंदबाजी-छोर से गेंद डाल रहा है। कोई भी क्रिकेटर यह जानता है कि मिड-ऑफ पर खड़ा कोई फील्डर उस वक्त अपना पूरा ध्यान बल्लेबाज पर इस उम्मीद के साथ केंद्रित रखता है कि बल्लेबाज उसकी तरफ ही गेंद ड्राइव करेगा। लेकिन बट किस तरफ देख रहे थे? उनकी निगाह अपने बॉलर के कदमों पर टिकी थी, जो यह पक्का कर लेना चाहती थी कि गेंदबाज सचमुच नो-बॉल डाले, जैसा कि उन्होंने न्यूज ऑफ द वर्ल्ड  के ‘नकली शेख’ मजाहर महमूद से वायदा किया था।


हालांकि सलमान बट तब कुछ ही वक्त पहले अपनी टीम के कप्तान बनाए गए थे, लेकिन उन्होंने जो किया, उसे हममें से अनेक लोगों के लिए भुला पाना मुश्किल है, क्योंकि हमें यह महसूस होता है कि खेल प्रेमियों के साथ बट ने दगाबाजी की थी। साल 2010 के उस दौर को याद कीजिए। इंग्लैंड दौरे के समय पाकिस्तान क्रिकेट में जबर्दस्त उठा-पटक चल रही थी। शाहिद आफरीदी ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एक टेस्ट मैच में कप्तानी करने के बाद अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उनकी जगह एक सुसंस्कृत, बेबाक और माइक पर बेहद विनम्रता से बोलने वाले सलमान बट को लाया गया था। जिस तरह से दक्षिण अफ्रीका के कलंकित कप्तान हैंसी क्रोनिए के बारे में लगा था कि वह काफी अच्छे इंसान और खिलाड़ी हैं और युवा क्रिकेटरों के रोल मॉडल बन सकते हैं, कुछ वैसा ही सलमान बट के बारे में लगा था। लेकिन बट ने भी वही किया, जो क्रोनिए ने किया था।

यह दलील दी जा सकती है कि पाकिस्तानी क्रिकेटरों के साथ कठोर व्यवहार किया जा रहा है। उनके कृत्य से किसी की मौत नहीं हुई। क्या किसी ने यह कुबूल किया कि इससे न्यूज ऑफ द वर्ल्ड  को कोई आर्थिक नुकसान हुआ? दो पाकिस्तानी गेंदबाजों ने उस टेस्ट मैच में तीन नो बॉल डाले, जिनका मैच के परिणाम पर कोई असर नहीं पड़ने जा रहा था। मुमकिन है कि इन दलीलों में कुछ  दम हो, लेकिन इस तरह की बेईमानी को जारी नहीं रहने दिया जा सकता। हमें यह अहसास कराना ही होगा कि चाहे स्पॉट फिक्सिंग (एक मैच के दौरान किसी खास गतिविधि को फिक्स करना) की बात हो या पूरे मैच को फिक्स करने की, उसके खिलाफ पूरी गंभीरता से कार्रवाई होगी। ऐसे मौके बहुत कम मिलते हैं, जब क्रिकेट में सीमा का अतिक्रमण करने वालों को दंडित करके कोई मिसाल कायम की जाए। और जब भी ऐसे अवसर आएं, तो पूरी संजीदगी के साथ कार्रवाई की जानी चाहिए। यदि हमें अपने खिलाड़ियों पर ही भरोसा नहीं रहेगा, तो फिर क्रिकेट का महत्व अपने आप खत्म हो जाएगा।


यदि किसी देश के तीन-तीन महत्वपूर्ण खिलाड़ियों को धोखाधड़ी और बेईमानी का दोषी करार दिया जाए, तो यह उसके लिए गहरा आघात पहुंचाने वाली घटना होगी। लेकिन पाकिस्तान के मामले में ऐसा नहीं महसूस हो रहा है। जिस वक्त इस पूरे मुकदमे की सुनवाई चल रही है, पाकिस्तानी टीम पश्चिम एशिया में श्रीलंका के खिलाफ टेस्ट श्रृंखला खेल रही है और ऐसा लगता है कि उस पर इस मुकदमे का कोई असर नहीं पड़ा है। गौरतलब है कि पाकिस्तान क्रिकेट ने कुछ समय के लिए पश्चिम एशिया के मैदानों को अपनी घरेलू श्रृंखलाओं को आयोजित करने के लिए गोद ले रखा है।


बहरहाल, पाकिस्तानी क्रिकेट में आत्मघाती प्रवृत्ति हो सकती है और यह भी सही बात है कि आतंकवादी खतरे के लिहाज से वह अपने यहां टेस्ट श्रृंखला की मेजबानी नहीं कर सकता, लेकिन इसके साथ ही यह भी उतनी ही बड़ी हकीकत है कि पाकिस्तानी क्रिकेट में जिंदा रहने की जबर्दस्त कला है और उसे अपने नायाब युवा क्रिकेटरों का हमेशा सहारा मिल जाता है। अगले दो महीने के भीतर ही इंग्लैंड की टीम को अबू-धाबी और दुबई में पाकिस्तानी टीम के खिलाफ मोरचा लेना है। जब ये दोनों टीमें टकराती हैं, तो कुछ न कुछ जरूर होता है। लेकिन इस मुकदमे ने इतना तो कर ही दिया है कि अब इनके बीच मुकाबले में शायद ही फिक्सिंग जैसा कुछ हो।

(लेखक पूर्व क्रिकेटर, पत्रकार और कमेंटेटर हैं। उनका यह आलेख द गार्जियन से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया जा रहा है।)
 
         
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