
वन्यजीव फोटोग्राफर करूपकर और सेनानी का 1997 में वीरप्पन गिरोह ने अपहरण कर लिया था। दोनों को करीब एक पखवाडे तक उनके साथ रहना पड़ा था। उन्हें सरकारी कर्मचारी समझकर फिरौती के लिए अपहरण कर लिया गया था।
अपहरण के दौरान दोनों को वीरप्पन के साथ चाय पीने और खाना खाने का भी मौका मिला। दोनों वीरप्पन से बातचीत भी करते थे। दोनों के अनुभवों को पत्रकार एस आर रामकष्ण ने अनुवाद किया है और पेंगुइन ने इसे प्रकाशित किया है। इसमें यह जिक्र भी किया गया है कि वीरप्पन और उसके गिरोह के सदस्य किस प्रकार अगवा लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते थे। वीरप्पन सिर्फ एक पुराने ट्रांजिस्टर के जरिए बाहरी दुनिया से जुड़ा हुआ था।
पुस्तक से पता लगता है कि दोनों किस प्रकार अपने अपहरण के दौरान आनंद प्राप्त कर रहे थे। इस पुस्तक में बंधकों के सामने मौत का भय और रोमांच का भी आकर्षक तरीके से चित्रण किया गया है। करूपकर और सेनानी ने अपने अनुभवों को 1998 में लिखा था। यह कन्नड़ साप्ताहिक पत्रिका सुधा में प्रकाशित हुआ था और पाठकों के बीच इसे काफी पसंद किया गया था।
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