आईआईएम बंगलुरु में पढ़ने वाली मालिनी ने पिछले दिनों फांसी लगाकर जान दे दी। वजह बना फेसबुक और 726 फ्रेंड्स। फेसबुक से बड़ी वजह है 726 ‘दोस्त।’ मालिनी के एक लड़के से रिश्ते थे। यह कोई बड़ी बात नहीं है। रिश्ता टूट गया, यह भी बड़ी बात नहीं थी। उस लड़के ने फेसबुक पर लिख दिया- मैं आज बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूं..मैंने अपनी नई गर्लफ्रेंड को छोड़ दिया..। इसे भी हम एक आम बात मान सकते हैं। लेकिन खास चीज थी, ऐसी बेहद ‘पर्सनल’ बात का 726 दोस्तों के सामने ऐलान कर देना। मालिनी सार्वजनिक अपमान बर्दाश्त नहीं कर पाई और फांसी के फंदे पर झूल गई। फेसबुक पर उसके गिने-चुने ही दोस्त होते, तो शायद वो यह कदम न उठाती। ऐसे कई लोग हैं, जो फेसबुक पर तो हैं, लेकिन उनके दोस्तों की लिस्ट में 50 से ज्यादा फ्रेंड नहीं। उनका बहुत सीधा-सा तर्क है कि मैं क्या हूं, कौन हूं, क्या करता हूं, क्या नहीं करता हूं, यह जानने का हक हर किसी को कैसे दिया जा सकता है?
एक वक्त था, जब परिवार सचमुच परिवार होते थे और दोस्त वाकई दोस्त। तकरीबन हर घर में कम से कम एक वक्त का भोजन साथ करना है- यह नियम था। कुछ बड़े मसले आए या कोई महत्वपूर्ण बात हो, तो एक दोस्त दूसरे दोस्त को फोन करके कहता था- फोन पर बात नहीं हो सकेगी, मिलकर बात करेंगे। लेकिन अब यह सब कहीं खो गया है। अब परिवार एक साथ लंच-डिनर पर कहां बैठते हैं और दोस्तों का अक्सर मिलते रहना भी कहां हो पाता है। न इसके मौके बचे हैं और न ही गुंजाइश। आंखों में आंखें डालकर, एक-दूसरे का हाथ थामकर या कंधे पर हाथ रखकर भरोसा देने के लिए अब भी हाथों का इस्तेमाल तो होता है़, लेकिन मोबाइल की-पैड पर या लैपटॉप के की-बोर्ड पर।
बाईस साल का एक लड़का मुझे रोज अपने दोस्त के साथ जिम में मिलता था। एक बार कई दिन तक वह जिम नहीं आया, तो उसके दोस्त से पूछने पर पता चला कि वह बीमार है। मैंने पूछा कि तुम देखने गए, तो जवाब था- नहीं, मुझे उसका घर ही नहीं पता। फिर कैसे पता कि वो बीमार है? उसने अपनी वॉल पर लिखा था- ‘नॉट कीपिंग वेल दीज डेज।’ ऐसे न जाने कितने दोस्तों को आज एक-दूसरे के घर का पता नहीं मालूम। इंटरनेट से सात समंदर दूर बैठा दोस्त तो पास आ गया है, लेकिन सात किलोमीटर पास बैठा दोस्त दूर हो गया।
विनोद कापड़ी, मैनेजिंग एडिटर, इंडिया टीवी
साभार: हिन्दुस्तान
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